आज 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जा रहा है। एक समय था जब डाक जरिया हुआ करता था लोगों से बातचीत करने, रुपए पैसे भेजने का लेकिन आधुनिकता के चलते धीरे-धीरे इसका महत्व कम हो गया।  लेकिन अब भी डाक टिकटों के शौकीन लोग हैं जिन्होंने डाक टिकट को संग्रहित करके अपने पास रखा हुआ है।

विश्व डाक दिवस ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ के गठन के लिए 9 अक्टूबर 1874 को स्विटजरलैंड में 22 देशों ने एक संधि की थी। उसके बाद से हर साल 9 अक्टूबर को ‘विश्व डाक दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है। भारत एक जुलाई 1876 को ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ का सदस्य बना था। वैसे भारत में एक विभाग के रूप में इसकी स्थापना 1 अक्टूबर, 1854 को लार्ड डलहौजी के समय में हुई।

कब जारी हुआ था दुनिया का पहला डाक टिकट

दुनिया का पहला डाक टिकट आज से 178 साल पहले जारी किया गया था जबकि इसका पहला इस्तेमाल 6 मई 1840 को हुआ था। इस डाक टिकट का नाम ब्लैक पेनी था और इसे ब्रिटेन में जारी किया गया था। इसपर महारानी विक्टोरिया का चित्र बना था और उस वक्त इसकी कीमत थी एक पेनी। उन दिनों एक पेनी के डाक टिकट से 14 ग्राम तक का पत्र किसी भी दूरी तक भेजा जा सकता था। दुनिया के इस पहले डाक टिकट की शुरूआत समाज सुधारक रोलैंड हिल ने की थी।

देश का पहला डाक टिकट

भारत का पहला डाक टिकट 21 नवंबर 1947 को जारी हुआ था। इसका इस्तेमाल केवल देश के अंदर डाक भेजने के लिए किया जाता था। इस पर भारतीय ध्‍वज का चित्र अंकित था और जय हिंद लिखा हुआ था। आजाद भारत का पहला डाक टिकट साढ़े तीन आना राशि यानी 14 पैसे का था। देश मे भेजे जाने वाली डाक के लिए पहले डाक टिकट पर अशोक के राष्ट्रीय चिन्ह का चित्र बना था। इसकी कीमत डेढ़ आना थी। आजाद भारत में महात्मा गांधी ऐसे पहले भारतीय थे, जिन पर डाक टिकट जारी किया गया था। देश में अब तक जितनी भी हस्तियों पर डाक टिकट जारी किए गए हैं, उनमें से सबसे ज्यादा टिकट महात्मा गांधी के नाम पर ही जारी हुए थे।

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