भारत जैसे देश के लिए जहां प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में लाखों मतदाता होते हैं, वोटों की गिनती एक कठिन प्रक्रिया है। इसमें तेज़ी से सही काम करने की ज़रूरत होती ह। जैसा कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव परिणाम आ गया है तो हम आपको बताते हैं कि काउंटिंग रूम में कौन-कौन होता है और वे मतगणना कैसे करते हैं।

वोटों की गिनती कहां होती है? 

आइडियली निर्वाचन क्षेत्र में सभी मतों की गणना एक ही जगह पर की जानी चाहिए लेकिन आम चुनावों के दौरान, जब कई विधानसभा क्षेत्रों के साथ सीटें बड़ी होती हैं, तो गिनती किए जाने वाले मतों की संख्या के आधार पर कई मतगणना केंद्र नियुक्त किए जा सकते हैं। मतगणना के लिए जगह रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) तय करता है जिसमें विधानसभा क्षेत्रों में कई केंद्र सहायक रिटर्निंग ऑफिसर (एआरओ) की देखरेख में होते हैं।

मतगणना केंद्रों में, वैसे तो सभी वोटों की गिनती एक बड़े हॉल में की जाती है जिसमें कई टेबल होते हैं। हालांकि, अगर आरओ को लगता है कि भीड़भाड़ का खतरा है, तो चुनाव आयोग (ईसी) से अनुमति के बाद और कमरे खोले जा सकते हैं। मतगणना केंद्रों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ चारदीवारी में रखा गया है। सरकारी स्कूल और कॉलेज भवनों का आमतौर पर इसके लिए उपयोग किया जाता है। 

रिटर्निंग ऑफिसर

चुनाव आयोग हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए आरओ नियुक्त करता है। चुनाव की अवधि के दौरान, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष रूप से चुनाव कराने के लिए आरओ के पास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज़्यादा अधिकार होता है, जिसके पास कई तरह की पावर होती हैं। मतगणना केंद्रों को नामित करना और उन्हें आयोग से उन्हें पहले से अप्रूव कराना, उम्मीदवारों को वोटों की गिनती की जगह, तारीख और समय के बारे में नोटिस भेजना, मतगणना कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रशिक्षण कराना, वोटों की गिनती और परिणाम घोषित करना जैसे ज़िम्मेदारियाँ रिटर्निंग ऑफिसर निभाता है।

आरओ खुद सभी वोटों की गिनती नहीं करते हैं लेकिन गिनती को कई चरणों में वेरीफाई करते हैं और परिणामों की घोषणा करते हैं। वे चुनाव में मतगणना के मामले में फाइनल अथॉरिटी होते हैं। आरओ की मदद के लिए, इलेक्शन कमीशन सहायक रिटर्निंग ऑफिसर (एआरओ) भी नियुक्त करता है। एक निर्वाचन क्षेत्र में कई मतगणना केंद्र होने की स्थिति में हर केंद्र एक एआरओ की निगरानी में होता है। निर्वाचन क्षेत्र की ज़रूरतों के मुताबिक नियुक्त एआरओ की संख्या अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर, जिला मजिस्ट्रेट लोकसभा चुनावों में आरओ होते हैं जबकि उप-विभागीय मजिस्ट्रेट राज्य विधानसभा चुनावों में आरओ होते हैं।

मतगणना पर्यवेक्षक और सहायक

एक काउंटिंग रूम में कई काउंटिंग टेबल होते हैं, जिनमें से हर टेबल राउंड टू राउंड आधार पर पोस्टल बैलेट या ईवीएम की एक निर्धारित संख्या की गिनती करता है। हर टेबल पर एक मतगणना पर्यवेक्षक और अधिकतम दो सहायक होते हैं जो वास्तविक मतगणना करते हैं। ये सहायक आरओ राजपत्रित अधिकारी होते हैं। इन्हें आरओ द्वारा नियुक्त किया जाता है। इन्हें इनके काम के हिसाब से ट्रेनिंग दी जाती है। 

ईसी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक

चुनाव आयोग प्रत्येक मतगणना कक्ष में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करता है, जिन्हें कार्यवाही रिकॉर्ड करनी होती है और रिपोर्ट दर्ज करनी होती है। ये आमतौर पर भारत सरकार के कर्मचारी होते हैं, और इन्हें चुनाव तंत्र के सारे कामकाज की देखरेख करने का काम सौंपा जाता है। जहां मतगणना की जा रही है, वहां हर टेबल के लिए माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए जाते हैं। मतगणना के प्रत्येक दौर में पर्यवेक्षकों को कुछ ईवीएम के लिए गिने गए वोटों को वेरीफाई करना होता है। कुल मिलाकर, ये जमीन पर चुनाव आयोग की आंखें और कान होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सारा काम ठीक से हो रहा है। 

प्रत्याशी व मतगणना अभिकर्ता 

मतपत्र पर मौजूद उम्मीदवारों को भी उनके प्रतिनिधियों के साथ मतगणना कक्ष में जाने की अनुमति होती है। सभी पार्टियां और उम्मीदवार मतगणना एजेंटों को यह सुनिश्चित करने के लिए भेजते हैं कि वोटों की निष्पक्ष और प्रक्रिया के अनुसार गिनती हो और यदि कोई गड़बड़ हो तो वे इसकी शिकायत दर्ज करें। ये मतगणना एजेंट हैंडबुक फॉर काउंटिंग एजेंट्स में निर्धारित एक निश्चित कोड से बंधे होते हैं। 

सुरक्षा

सशस्त्र बलों को आम तौर पर मतगणना कक्ष में प्रवेश नहीं करने दिया जाता लेकिन वे सुरक्षा के कई स्तरों को बनाए रखने के प्रभारी होते हैं। उन्हें मतगणना कक्ष के साथ-साथ जिस रास्ते से ईवीएम को उनके स्ट्रांग रूम  से मतगणना कक्ष में लाया जाता है, दोनों जगह की सुरक्षा करनी होती है। सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस सहित सुरक्षा बल, निर्वाचन क्षेत्र के आरओ के अधिकार में होते हैं।

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