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प्रयाग से इलाहाबाद और फिर प्रयागराज बनने की कहानी
कभी कुंभनगरी, कभी संगमनगरी तो कभी तीर्थराज कहे जाने वाले इस शहर को लोग आज भी उतना ही पवित्र मानते हैं जितना वर्षों पहले मानते थे।
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  • प्रयागराज

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    इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने की मांग कई वर्षों से उठती आ रही है। एक बार महामना मदन मोहन मालवीय ने भी इसका नाम बदलने की मुहिम छेड़ी थी। 1996 के बाद इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम फिर से शुरू हुई। अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेद्र गिरी भी नाम बदलने की मुहिम में आगे आया लेकिन किसी भी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद इस मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया और आखिरकार अब सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर ही दिया।

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    वेदों से लेकर पुराणों तक में प्रयागराज के महत्म्य के बारे में खूब लिखा गया है। प्रयागशताध्यायी' के में लिखा है कि काशी, मथुरा, अयोध्या जैसी सप्तपुरियां तीर्थराज प्रयाग की रानियां हैं, जिनमें काशी को पटरानी का दर्जा प्राप्त है। सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियां, सभी तीर्थ और सभी नदियां तराजू के एक पलड़े पर रखीं और दूसरी ओर सिर्फ 'तीर्थराज प्रयाग' को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। 

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    गोमुख से इलाहाबाद तक जहां कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है, उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे- देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि। केवल वह जगह जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है, उसे 'प्रयागराज' कहा गया। प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-

    को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ।

    सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ।।

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    मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक में प्रयागराज मुख्य नगर रहा है। मौर्य शासक अशोक के 6 स्तंभ यहां संगम तट पर बने किले में मिले हैं तो गुप्तकाल में तो यह कई शासकों की राजधानी भी रहा। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण का लिखा हुआ 'प्रयाग प्रशस्ति' उसी स्तंभ पर खुदा है, जिस पर अशोक का। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसके बारे में लिखा है कि इस काल में पाटलिपुत्र और वैशाली पतनावस्था में जबकि दोआब में प्रयाग और कन्नौज का विकास हो रहा था। 

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    मुगलकाल में इलाहाबाद सबसे ज्यादा समृद्ध हुआ। अबुल फजल ने लिखा है कि काफी लंबे समय से अकबर को एक अच्छे नगर की तलाश थी और उनकी ये तलाश गंगा, यमुना की संगम नगरी पियाग (प्रयाग) में आकर पूरी हुई। 13 नवंबर 1573 को अकबर खुद यहां आए और उन्होंने यहां चार किले बनवाने की योजना बनवाई। अब्दुल कादिर बदांयुनी ने लिखा है कि बादशाह ने यहां लाहबाद नाम की एक बड़ी इमारत बनाने की नींव रखी। निजामुद्दीन अहमद ने इसके निर्माण के लिए दो अलग तारीखें दीं। 1575 में अकबर ने यहां एक किला बनवाया और इस शहर का नाम इलाहाबास रखा। इसके बाद 1584 में शाहजहां ने इसका नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया। 

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    1575 के बाद अब 2018 में यानि 443 साल बाद एक बार फिर प्रयागराज को अपना पुराना नाम मिल गया है। इसके लिए 2017 से ही प्रयास शुरू हो गए थे। किसी भी शहर या जगह का नाम बदलवाने के लिए किसी शहर के स्थानीय लोग या जनप्रतिनिधि नाम बदलने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजता है। इसके बाद राज्य मंत्रिमंडल प्रस्ताव पर विचार करती है और मंजूरी देने के बाद राज्यपाल की सहमति को भेजती है। फिर राज्यपाल प्रस्ताव पर अनुंशसा देने के साथ अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय गृहमंत्रालय को भेजता है और गृहमंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद राज्य सरकार नाम बदलने की अधिसूचना जारी करती है।

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