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इतिहास से लेकर वर्तमान तक, ये है अयोध्या का पूरा विवाद
आइए जानते हैं कि बाबरी मस्जिद के बनने से लेकर अभी तक इस अयोध्या विवाद में क्या-क्या हुआ…
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अयोध्या का राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद लगभग 70 साल से भी पुराना है, लेकिन इस मामले पर कोई फैसला आज तक नहीं आ सका। आज से सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर रोज चर्चा होगी। सुप्रीम के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की पीठ मिलकर इस मुद्दे पर फैसला देगी। आइए जानते हैं कि बाबरी मस्जिद के बनने से लेकर अभी तक इस अयोध्या विवाद में क्या-क्या हुआ…

  • बाबरी मस्जिद का बनना

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    1528 में बनी थी बाबरी मस्जिद

    1528 में भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया गया। इस मस्जिद का नाम मीर बाकी मीर ने बाबरी मस्जिद रखा था।

  • रामजी की मूर्ति

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    23 दिसंबर, 1949 को लगभग 50 हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के मुख्य स्थान पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी और वहां रोज पूजा करना शुरू कर दिया। इसके बाद मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ना बंद कर दिया। 

    16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद नाम के शख्स ने फैजाबाद कोर्ट में एक अपील दायर करके बाबरी मस्जिद में रखी गई रामलला की मूर्ति की पूजा की विशेष इजाजत मांगी। इसके साथ ही उन्होंने मांग की कि इस जगह से मूर्ति हटाने पर न्यायिक रोक लगा दी जाए।

    5 दिसंबर, 1950 को बाबरी मस्जिद में हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और राममूर्ति रखने के लिए  महंत परमहंस रामचंद्र दास ने मुकदमा दायर किया। इसके साथ ही मस्जिद को 'ढांचा' नाम दिया गया।

    17 दिसंबर, 1959 को निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

    18 दिसंबर, 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

    1984 को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। एक समिति का गठन किया गया।

    1 फरवरी, 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

    जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया। 

  • बाबरी मस्जिद विध्वंस

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    6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या पहुंचकर हजारों की संख्या में कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया। उस वक्त अयोध्या में बस कुछ नारे गूंज रहे थे, मसलन एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो। बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का।  बाबरी विध्वंस के बाद देशभर में दंगे हुए। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया। 

    16 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच के लिए एमएस लिब्रहान आयोग का गठन किया गया। 

    1994 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में बाबरी मस्जिद विध्वंस से संबंधित केस की सुनवाई शुरू हुई।

    4 मई, 2001 को स्पेशल जज एसके शुक्ला द्वारा भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित 13 नेता आरोप मुक्त किए गए। 

    1 अप्रैल 2002 को अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर इलाहबाद हाईकोर्ट के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की। मंदिर या मस्जिद के प्रमाण के लिए 5 मार्च 2003 को इलाहबाद हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में खुदाई का निर्देश दिया।

    22 अगस्त, 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई के बाद इलाहबाद हाईकोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि मस्जिद के नीचे 10वीं सदी के मंदिर के अवशेष प्रमाण मिले हैं। हालांकि, इस रिपोर्ट को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने चुनौती दी।

    सितंबर 2003 में अदालत ने फैसला देते हुए कहा कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।


  • सुप्रीम कोर्ट

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    जुलाई 2009 में लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी। 

    26 जुलाई, 2010 को इस मामले की सुनवाई कर रही इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा और सभी पक्षों को आपस में इसका हल निकाले की सलाह दी।

    28 सितंबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाईकोर्ट को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का रास्ता साफ किया।

    30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन का तीन हिस्सों में बंटवारा कर दिया। इसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े को मिला।

    9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

    21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने को कहा। 

    19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित भाजपा और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया। 

    16 नवंबर 2017 को आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और कई पक्षों से मुलाकात की।

    5 दिसंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान 8 फरवरी तक सभी दस्तावेजों को पूरा करने के लिए कहा। 


  • राम मंदिर के समर्थन में रैली

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    8 फरवरी 2018 को सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट से मामले पर नियमित सुनवाई करने की अपील की। हालांकि, उनकी याचिका खारिज हो गई। 

    14 मार्च 2018 को वकील राजीव धवन ने कोर्ट से साल 1994 के इस्माइल फारूकी बनाम भारतीय संघ के फैसले को पुर्नविचार के लिए बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग की। 

    20 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने राजीव धवन की अपील पर फैसला सुरक्षित रखा। 

    27 सितंबर 2018 को कोर्ट ने इस्माइल फारूकी बनाम भारतीय संघ के 1994 का फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया और कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दीवानी वाद का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और पूर्व का फैसला सिर्फ भूमि आधिग्रहण के केस में ही लागू होगा।

    1 दिसंबर 2018 को आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और कुछ दूसरी दक्षिण पंथी विचार धान की संगठनों ने एक रैली निकाली, जिसमें उन्होंने नारा दिया - विकास नहीं, मंदिर चाहिए। 


  • मध्यस्थता कमेटी

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    1 जनवरी 2019 को केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थान के आसपास 67.390 एकड़ गैर-विवादित अधिग्रहित जमीन मूल मालिकों को लौटाने की अपील की।

    8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों वाली पीठ ने तीन सदस्यों को मध्यस्थता समिति का सदस्य बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला इस समिति के प्रमुख थे। उनके अलावा पैनल में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल किया गया। हिंदू महासभा के वकील वरुण कुमार सिन्हा ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि मध्यस्था के हमारे पुराने अनुभव बुरे ही रहे हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इसपर विचार करना चाहिए। 

    15 जून 2019 को उत्तर प्रदेश उप मुख्य मंत्री केशव मौर्या ने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण जल्द ही करवाया जाएगा, इसके लिए तीन विकल्पों पर मंथन चल रहा है। पहला- कोर्ट की मध्यस्थता कमिटी के जरिए आपसी सहमति बनाकर। दूसरा- कोर्ट के फैसले के आधार पर और अगर ये दोनों विकल्प सार्थक नहीं निकले तो संसद में कानून बनाकर। केशव मौर्य ने कहा कि राम मंदिर के निर्माण में कोई संशय नहीं है, यह अवश्य बनेगा। 


  • चीफ जस्टिस रंजन गोगोई

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    11 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले को लेकर सुनवाई हुई। इस मसले पर याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि अदालत ने मध्यस्थता का जो रास्ता निकाला था, वह काम नहीं कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस पर मध्यस्थता पैनल से रिपोर्ट की मांग की।

    18 जुलाई को प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति को कहा कि मध्यस्थता कार्यवाही के परिणामों के बारे में 31 जुलाई या एक अगस्त तक अदालत को सूचित करें ताकि वह मामले में आगे बढ़ सके।

    1 अगस्त 2019 को अयोध्या राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मध्यस्थता कमेटी ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दायर की

    2 अगस्त 2019 को अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में मध्यस्थता से कोई नतीजा नहीं निकल सका। कुछ पक्षों ने मध्यस्थता पर सहमति नहीं जताई। 6 अगस्त से अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी। पांच जजों के संविधान पीठ का यह फैसला लिया।

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