”एक ऐसे देश में जहां की औसत आयु 68 साल है, मेरी परदादी 94 साल जिंदा रहीं। मेरे दादा-दादी ने अपने बचपन के दिनों में जो हेल्दी खाना खाया था, उसी का नतीजा था कि उनका स्वास्थ्य बेहतर रहा। वो हमेशा मुझे जंक फूड खाने के लिए मना किया करते थे, लेकिन यहां गलती किसकी है? मेरे पेरेंट्स की या मेरी, जो लोकल स्टोर से हेल्दी खाना खरीद कर लाते हैं, ये सोचे बिना कि उससे उगाने में कितने रसायनिक कीटनाशक और खाद इस्तेमाल की गई और उसे जल्दी बढ़ाने के लिए कितने इंजेक्शन लगाए गए हैं। शायद हम दोनों की ही गलती नहीं है”, कर्नाटक के डॉ. खादर वल्ली, 1690 के दिनों को याद करते हुए कहते हैं। 

यही वह वक्त था जब भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, लेकिन ये क्रांति अपने साथ हमारी सबसे खास फसल बाजरा लिए गई। भारत को भोजन की कमी वाले देश से बदलकर दुनिया में कृषि के मामले में अग्रणी देशों में शामिल करते किसान ये भूलते जा रहे हैं कि फसलों को पारंपरिक ढंग से न उगाकर वे उसके सारे पोषक तत्वों को खत्म कर दे रहे हैं। डॉ. खादर वल्ली कहते हैं कि हरित क्रांति ने बजारे जैसे मोटे अनाज वाली फसलों को एकदम खत्म कर दिया क्योंकि उन्हें मॉर्डन पॉप्युलेशन के उपयुक्त नहीं माना जा रहा था और लोग ऐसा कहते हैं कि ये अनाज सिर्फ गरीब ही खाते हैं। 

डॉ. खादर ने अपनी पूरी जिंदगी लोगों की इस सोच को बदलने में लगा दी कि बाजरा कितना जरूरी और पोषक अनाज है। वह कहते हैं कि एक वक्त था जब देश में लगभग 40 फीसदी बाजरे का उत्पादन होता था, लेकिन फिर ये खत्म हो गया। कुछ लोग इसे सिर्फ चिड़ियों को खिलाने के लिए उगाने लगे। अब इसका उत्पादन कम होकर 20 फीसदी पर आ गया है, लेकिन शायद लोग ये नहीं जानते कि इस अनाज में डायबिटीज, मोटापा, बांझपन, एनीमिया और कैंसर जैसे रोगों में कितना फायदेमंद है।

मैसूर में रहने वाले 61 साल के डॉ. खादर लोगों की इस सोच को बदलने का काम कर रहे हैं। बंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से पीएचडी करने के बाद उन्होंने एक अमेरिकी कंपनी ज्वॉइन कर ली। यहां चार उन्होंने नौकरी की। उस वक्त वह 34 साल के थे जब उन्होंने भारत लौटने का निश्चय किया। इसने उसे उस जादुई अनाज का पीछा करने के लिए प्रेरित किया, जो खाने से लोगों की कुपोषण की समस्या दूर हो सकती है। वह कहते हैं कि पीएचडी करते वक्त ही मुझे हमारी डायट के बुरे परिणामों का आभास हो गया था, लेकिन इस बात का पूरी तरह मुझे अहसास 1986-87 में हुआ, जब 6 साल की एक बच्ची को पीरियड्स शुरू हो गए। मैं उस वक्त अचंभित था। इस केस ने मुझे इस बात का अहसास दिलाया कि इस समस्या की जड़ में जाना जरूरी है और मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि खान-पान में जरूरी पोषक तत्वों का न होना ही इस तरह की समस्याओं का कारण है।

डॉ. खादर ने अपनी बेहतरीन नौकरी छोड़ दी ताकि वह आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ जीवन दे सकें। मिलेट मैन ऑफ इंडिया के नाम से जाने जाने वाले डॉ. खादर के पास हर दिन सैकड़ों मरीज इस उम्मीद के साथ आते हैं कि उनकी बीमारी जल्दी ही ठीक हो जाएगी। इनमें से बहुत से मरीजों को वह यही समझाते हैं कि एक सामान्य सी जीवनशैली अपनाकर वह खुद को हमेशा स्वस्थ रख सकते हैं। वह कहते हैं कि खाने में थोड़ा सा बदलाव करते और थोड़ी सी दवाओं के साथ कई बीमारियां ठीक हो सकती हैं। उनके पास डायबिटीज के कुछ ऐसे पेशेंट्स आए जिनके पैर बहुत कमजोर हो गए थे लेकिन उनकी बताई लाइफस्टाइल अपनाने के बाद वे बिल्कुल ठीक हो गए। 

वह कहते हैं कि आज से 60 साल पहले की तरह मैं अपने मरीजों को कोदो बाजरा, बरनार्ड बाजार, कंगनी यानि फॉक्सटेल मिलेट, ब्राउन टॉप मिलेट, सावा खाने की सलाह देता हूं। वह कहते हैं कि ऐसा कोई भी खाना 

जो रक्त द्वारा अवशोषित होने के लिए ग्लूकोज और फ्रुक्टोज को तोड़ने में अधिक समय लेता है, हेल्दी होता है। जहां रागी इस काम में 2 घंटे लगाती है, मिलेट्स इसमें 6 घंटे लगाते हैं, जबकि चावल ये काम सिर्फ 45 मिनट में कर देता है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. वल्ली कहते हैं कि ये अनाज सिर्फ हमारे शरीर के लिए ही नहीं मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में काफी कारगर होते हैं, इसलिए इनका सेवन करते रहना चाहिए। वह कहते हैं कि हमें अपनी वर्षों पुरानी आदत को बदलकर एक बार फिर मोटे अनाज की तरफ लौटना चाहिए और बीमारियों से दूर रहना चाहिए। 

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