अगर आपके साथ मारपीट या फिर जानलेवा हमला जैसी कोई भी घटना होती है, तो ऐसी दशा में आप उस व्यक्ति को सजा दिलाने के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं। भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) के अंतर्गत ऐसी धाराएं हैं, जिसके तहत अलग-अलग दशाओं में मारपीट की घटना पर छह माह से लेकर दस साल तक सश्रम कारावास की सजा का प्रावधान है। साधारण मारपीट पर आईपीसी की धारा 323, जख्मी होने की दशा आईपीसी की धारा 324 और जानलेवा हमला की घटना पर आईपीसी की धारा 307 के तहत पुलिस मामला दर्ज करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करती है। मारपीट की घटना में ऐसी कई धाराएं होती हैं जो कि वर्तमान स्थिति और अपराध करने के तरीके के हिसाब से एफआईआर के बाद भी बढ़ाई जाती है। मारपीट के दौरान कौन-कौन सी धाराएं लग सकती हैं, इस बारे में इंडियावेव आपको विस्तार से बता रहा है।

साधारण मारपीट पर मामला पर धारा 323

अगर कोई व्यक्ति किसी के साथ साधारण मारपीट (थप्पड़ मारना)  करता है, तो ऐसी दशा में पुलिस मामला दर्ज करने से कतराती है। लेकिन न्यायालय के डर से पुलिस साधारण मारपीट का भी केस आईपीसी की धारा 323 के अंतर्गत दर्ज कर लेती है। कानूनी जानकार कहते हैं कि अगर मारपीट की हुई है तो पीड़ित को एफआईआर दर्ज होते ही मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी) ले लेना चाहिए। स्थानीय थाने की पुलिस मारपीट की घटना के बाद स्थानीय सरकारी अस्पताल में पीड़ित का मेडिकल परीक्षण कराती है। अगर किसी दशा में पुलिस मेडिकल नहीं करा रही है तो पीड़‍ित स्वयं भी मेडिकल करा सकता है। एमएलसी ही अदालत में केस को मजबूती प्रदान करती है। आईपीसी की धारा 323 के तहत दर्ज हुए केस पर (धारा 334 के मामले को छोड़कर) एक साल तक का सश्रम कारावास या एक हजार रुपये जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और कोई भी न्यायाधीश मामले पर विचार कर सकता है। इस अपराध में पीड़ित या चोटिल व्यक्ति चाहे तो समझौता भी कर सकता है। 

घातक हथियारों से हमला पर धारा 324

मारपीट के दौरान ही अगर कोई व्यक्ति किसी को घातक हथियार से जख्मी करता है, तो ऐसी दशा में पुलिस आईपीसी की धारा-324 के तहत मामला दर्ज करती है। जख्मी होने पर पुलिस बयान के आधार पर और तहरीर मिलने पर एफआईआर दर्ज करती है। इस दशा में अगर आरोपी दोषी करार दिया जाता है तो उसे अधिकतम तीन साल की कैद हो सकती है। इस धारा में अगर कोई व्यक्ति चाकू घोंपने, गोली चलाने से चोट पहुंचाना, आग या किसी भी गरम पदार्थ, विस्फोटक पदार्थ या फिर जानवर के जरिए शरीर को क्षति होती है तो ऐसी दशा में भी दोषी व्यक्ति को तीन साल तक का सश्रम कारावास या जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह अपराध गैर-जमानती है और इसमें समझौता नहीं हो सकता है। यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इसे किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचार किया जा सकता है। 

गंभीर चोट की दशा में धारा 325

अगर किसी भी व्यक्ति की मारपीट के दौरान हड्डी फैक्चर होती है या फिर उसे गंभीर चोटें आती हैं तो ऐसी दशा में आईपीसी की धारा-325 के तहत भी मामला दर्ज होता है। यह मामला भी संज्ञेय है लेकिन इसमें समझौता हो सकता है। यह भी एक जमानती अपराध है। इस अपराध में दोषी करार होने पर 7 साल तक की कैद, आर्थिक दंड या फिर दोनों ही दंड दिए जा सकते हैं। यह धारा उस दशा में लगती है जब अपराध जानबूझकर किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के लिए किया गया हो। 

गंभीर रूप से जख्मी होने की दशा में धारा 326

अगर कोई शख्स किसी को घातक हथियार से गंभीर रूप से जख्मी करता है, तो ऐसी दशा में आईपीसी की धारा-326 के तहत मुकदमा दर्ज होता है। किसी को चाकू मारना, किसी अंग को काट देना या ऐसा जख्म देना जिससे उसकी जान को खतरा हो, मारपीट के दौरान ही अगर कोई हड्डी या दांत तोड़ दे तो भी इस धारा के तहत मामला दर्ज किया जाता है। यह गैर जमानती अपराध है और इसमें समझौता नहीं किया जा सकता। इसमें दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को 10 साल तक का सश्रम कारावास या फिर उम्रकैद भी हो सकती है।

जानलेवा हमला की दशा में धारा 307

अगर कोई आदमी किस दूसरे व्यक्ति पर जान लेने की नीयत से हमला करता है और वह हत्या करने में नाकाम रहता है तो ऐसी दशा में अपराध करने वाले पर धारा-307 (हत्या का प्रयास) का केस दर्ज होता है। विधि विशेषज्ञों द्वारा कहा जाता है कि यह एक ऐसा अपराध होता है, जिसमें दोषी अपने बचने के लिए कोई साक्ष्य भी नहीं दे सकता है। इस अपराध में न्यायालय में साक्ष्य और गवाह के तौर पर पीड़ित व्यक्ति खुद ही होता है, ऐसी दशा में अपराध करने वाला शख्स बच ही नहीं सकता है। हत्या के प्रयास के मामले में दोषी पाए जाने की दशा में उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। यह बहुत ही संगीन और गैर जमानती अपराध है। इसमें दोषी को 10 वर्ष का सश्रम कारावास या फिर उम्रकैद की सजा के साथ-साथ आर्थिक दंड देने का भी प्रावधान किया गया है। यह एक गैर जमानतीय अपराध है। 

गैर इरादतन हत्या के प्रयास पर धारा 308

अगर किसी व्यक्ति पर कोई हमला करता है, परन्‍तु हमलावर का उद्देश्‍य जान से मारने नहीं होता, लेकिन पीड़‍ित को जान को खतरा हो जाए तो ऐसी दशा में आरोपी पर गैर इरादतन हत्या के प्रयास का मामला दर्ज होगा। पुलिस आईपीसी की धारा 308 के तहत केस दर्ज करती है। इसमें दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को अधिकतम 7 साल तक की सजा हो सकती है। 

अपशब्द कहने की दशा में धारा 504

मारपीट की घटना के दौरान ही अगर कोई व्यक्ति अपशब्दों का प्रयोग करता है, जिससे पीड़ित को ठेस पहुंचती है तो ऐसी दशा में आईपीसी की धारा 504 के तहत मामला दर्ज किया जाता है। यह जमानतीय अपराध है और इसमें समझौता भी हो सकता है। इस अपराध में दोषी पाए जाने की दशा में दो साल का सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। इसमें लोक शांति भंग होने की आशंका को देखते हुए पुलिस मामला तत्काल में इसी धारा में दर्ज कर लेती है। 

जान से मारने की धमकी देने पर धारा 506

अगर किसी भी व्यक्ति को कोई जान से मारने की धमकी देता है, तो ऐसी दशा में पुलिस धारा 506 के अन्तर्गत मामला दर्ज करती है। धारा 506 के तहत दो से सात साल की सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। वैसे, जान से मान मारने की धमकी देने पर दोषी व्यक्ति को दो साल तक की सजा, या जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। 

सरकारी कर्मचारी से मारपीट करने की दशा में

सरकार के लिए काम करने वाले कर्मचारियों से तू-तू, मैं-मैं भी बहुत महंगा साबित हो सकता है। सरकारी कर्मचारी के साथ में मारपीट करना और सरकारी कार्य में बाधा पहुंचने पर सीधे 10 साल की सजा है। सरकारी कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारतीय दंड संहिता में कई धाराओं का प्रावधान किया गया है, ताकि वे भयमुक्त होकर अपने कार्यस्थल पर काम कर सकें। सरकारी काम में रुकावट डालने पर धारा 353 के तहत दो साल की सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। इसके अलावा वाद-विवाद या अपशब्दों की की दशा में आईपीसी की धारा 504 के तहत दो साल की सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। इसके अलावा जान से मारने की धमकी देने की दशा में धारा 506 के तहत तीन से सात साल की सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। यही नहीं, सरकारी कर्मचारी से मारपीट करने की दशा में आईपीसी की धारा 332 के तहत तीन से 10 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। आईपीसी की धारा 332 सरकारी कर्मचारियों के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है। यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं। अगर किसी भी सरकारी आदमी के साथ मारपीट की घटना होती है, तो साधारण धाराओं के साथ ही साथ यह धाराएं भी लगाई जाती है।  

मारपीट में भी दर्ज होता है बल्वा

बल्वा शब्द सुनकर सभी हैरान और परेशान हो जाते हैं। आम जीवन में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि उस स्थान पर बल्वा हो गया। दरअसल, जहां 5 से अधिक व्यक्ति किसी के साथ मारपीट की घटना को अंजाम देते हैं तो वह अपराध बल्वा की धारा 146 के अंतर्गत भी दर्ज किया जाता है। आईपीसी की धाराओं में धारा 147, 148, 149 के अंतर्गत बताया गया है। धारा 147 के तहत बल्वा में दोषी पाए जाने की दशा में दो वर्ष तक की कैद, जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। धारा 148 के अन्तर्गत वह अपराध आता है, जब हथियारों के साथ में बल्वा किया जाता है। इस धारा में तीन साल की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। आईपीसी की धारा 149 के अंर्तगत पूरे समूह के साथ में हिंसा की जाती है। इसमें विधि के विरुद्ध जमाव होता है और प्रत्येक व्यक्ति हिंसा करने के ही मकसद से जाता है। इसमें सभी सजा के बराबर की भागीदारी होते हैं।

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