प्लास्टिक के कचरे से निपटने के लिए कई कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन प्रशासन से लेकर नागरिक तक हर कोई जानता है कि ये इतना आसान नहीं हैं। बड़े शहरों में तो ये समस्या और भी ज्यादा है।

वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। यानि हम हर रोज 15,000 टन प्लास्टिक कचरे में फेंकते हैं। इससे हवा से लेकर पानी तक सबकुछ दूषित हो रहा है। प्लास्टिक कचरे के खतरे को देखते हुए बंगलुरू में साल 2016 में ही इससे कैरी बैग्स, प्लेट्स, बैनर्स वगैरह पर बैन लगा दिया था। बृहत बंगलुरू महानगर पालिके (BBMP) के मुताबिक, शहर में एक दिन में लगभग 4,000 टन सॉलिड वेस्ट निकलता है, जिसमें से 20 फीसदी प्लास्टिक का कचरा होता है। 

यहां इससे निपटने के लिए कई स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। लोगों ने घरों में प्लास्टिक के थैलियों और प्लेट्स का इस्तेमाल करना कम कर दिया है तो कई रेस्त्रां भी ऐसे हैं जो खाने के लिए इको-फ्रेंडली पैकिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस सबके बावजूद समस्या खत्म नहीं हो रही है, लेकिन बंगलुरू के एक एनजीओ ने इससे निपटने के लिए एक बेहतरीन तरीका खोजा है। ये एनजीओ कचरे में फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक से टाइल्स और सिंचाई के पाइप बनाने का काम कर रहा है। इस एनजीओ का नाम है- ‘स्वच्छ’।  

टाइल्स में हैं कई खासियत

‘स्वच्छ’ एनजीओ ने BBMP के साथ मिलकर ‘री टाइल’ की शुरुआत की जिससे प्लास्टिक के टाइल्स बनाने शुरू हुए। इन टाइल्स का वजन काफी कम होता है, इसलिए इन्हें लगाने में भी काफी आसानी रहती है। दूसरा ये कि ये प्लास्टिक से बने होते हैं इसलिए इनके टूटने का खतरा भी कम होता है।  बेटर इंडिया के मुताबिक, इस कार्यक्रम के मुख्य अधिकारी वी राम प्रसाद कहते हैं कि इन टाइल्स को 150 डिग्री सेल्सियश तक की गर्मी में रखा जा सकता है और इनमें 35 टन वजन सहने की भी क्षमता है। ये इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि इन पर कोई फिसले न।  रामप्रसाद की मानें तो ये टाइल्स रेन वॉटर हार्वेस्टिंग भी कर सकते हैं।

ज्यादा देखरेख की जरूरत नहीं

रामप्रसाद कहते हैं कि स्वच्छ टाइल्स रिसाइक्लिंग से बने होते हैं। इन्हें पॉलीप्रोपीलीन के जरिये बनाया जाता है। इंटरलॉकिंग एज की वजह से इन्हें कहीं भी फिट किया जा सकता है। कमाल की बात ये है कि खराब और टूटी फर्श पर भी ये टाइल्स लगाए जा सकते हैं। इन्हें बनाने में कई तरह के केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए ये जल्दी खराब नहीं होते और इन पर कोई दाग भी आसानी से नहीं पड़ता।

इस तरह के कचरे का करते हैं इस्तेमाल

इन टाइल्स को शैंपू की बोतलों, रेस्टोरेंट के कंटेनर, दूध के पैकेट, पानी की बोतलों से बनाया जाता है। लोग इनका इस्तेमाल करके इन्हें फेंक देते हैं, लेकिन यही चीजें टाइल्स बनाने में काम आती हैं। 15 प्लास्टिक की बोतलों से एक टाइल बना ली दाती है। वहीं 150 पॉलिथीन या इतने ही डिस्पोजेबल चम्मच लग जाते हैं। इन टाइल्स को ग्राहक की जरूरत के मुताबिक डिजाइन किया जाता है।

घर से इकट्ठा किया जा रहा कूड़ा

ये एनजीओ अब घर-घर जाकर कूड़ा इकट्ठा करके सेंटर तक ला रहा है। इसके बाद उसे छांटा जाता है और फिर उसकी प्रॉसेसिंग शुरू होती है। इसे अलग – अलग 40 श्रेणियों में बांटा जाता है। ऐसा करने से प्रॉसेसिंग में आसानी रहती है। कचरे में प्लास्टिक के अलावा, कागज, लोहा और रबर भी होती है। इन्हें एक मशीन के जरिए बारीक करने की कोशिश की जाती है और फिर इनसे टाइल्स बनते हैं। 


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