भारत में समाजवादी पार्टी की स्थापना, भारत छोड़ो आंदोलन और अराजकता के खिलाफ छात्र आंदोलन… जयप्रकाश नारायण ने अपने जीवनकाल में विविध और सत्याग्रही भूमिकाएं निभाईं। भारतीय राजनीति में व्यवस्था के बदलाव के लिए संपूर्ण क्रांति के आह्वान से लेकर इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार को सत्ता से उखाड‍़कर लोकतंत्र की बहाली के लिए जयप्रकाश नारायण ने सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। उनके आंदोलन का असर रहा कि आज ही के दिन 44 साल पहले देश में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। 25 जून, 1975 को लगा आपातकाल 21 महीनों तक यानी 21 मार्च, 1977 तक देश पर थोपा गया। आज ही के दिन देश पर थोपे गए आपातकाल ने देश को कई नेता दिए। इंदिरा गांधी के इस आपातकाल ने देश की राजनीति की दशा ही बदल दी। इस आंदोलन ने देश को बड़े-बड़े नेता दिए। आपातकाल के जननायक जयप्रकाश नारायण के अलावा राज नारायण, मोरारजी देसाई अलावा इस आंदोलन से उभरे नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेई, चंद्रशेखर सिंह, वीपी सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, लालू प्रसाद यादव, नितिश कुमार, शरद यादव, जार्ज फर्नांडिस, सुबोधकांत सहाय, मुलायम सिंह यादव, रामकृष्ण हेगड़े और जाबिर हुसैन रहे जिन्होंने बाद में देश के अलग-अलग राज्यों में सत्ता संभाली। 

जॉर्ज फर्नांडिस

पूर्व रक्षामंत्री और श्रमिकों के नेता रहे जॉर्ज फर्नांडिस आपातकाल के दौरान बड़े नेता बनकर उभरे। वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस का राज्यसभा में आखिरी कार्यकाल अगस्त 2009 और जुलाई 2010 के बीच में था। साल 1975 में जब पूरा देश आपातकाल के दौर से गुजर रहा था, उसकी दौरान जॉर्ज फर्नांडिस एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे जो उन लोगों के लिए मसीहा बना, जो आपातकाल से पीड़ित थे। 1967 से 2004 तक 9 लोकसभा चुनाव लड़ने वाले फर्नांडिस ने कई सरकार विरोधी आंदोलन चलाए थे। विकिलीक्स ने खुलासा करके पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज के बारे में बताया था कि आपातकाल के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ और फ्रांस सरकार से आर्थिक मदद मांगी थी। यह वह दौर था जब जॉर्ज फर्नांडिज भूमिगत हो गए थे और सरकार विरोधी आंदोलन चला रहे थे।  जॉर्ज फर्नांडिस ने अंदर ही अंदर 1974 में रेलवे स्ट्राइक करा दी और अंडरग्राउंड हो गए। 1976 में पकड़े गए और हथकड़ियों में लिपटे जॉर्ज फर्नांडिस की फोटो अत्याचार की तस्वीर बन गई थी। 

रामकृष्ण हेगड़े

रामकृष्ण हेगड़े मिस्टर क्लीन भी कहे जाते थे। कर्नाटक के तीन बार मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े भारतीय राजनीति में अहम चेहरा रहे। हेगड़े राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे। 80 के दशक के आखिर में जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर थी और वीपी सिंह विपक्ष की राजनीति की धुरी बने प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदारों में से एक रहे। सुसंस्कृतिक, मृदुभाषी और विनम्र भाव के नेता रहे रामकृष्ण हेगड़े का लंबी बीमारी के बाद 12 जनवरी 2004 को निधन हो गया। वह ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिनकी हर कोई तारीफ करता था। विपक्षी दलों के नेताओं ने उनकी अनदेखी करके एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बना दिया था। रामकृष्ण हेगड़े कर्नाटक में मुख्यमंत्री के साथ ही केंद्र की सरकारों में मंत्री भी रहे। उनकी कार्यक्षमता की हर कोई उनका मुरीद था। हालांकि वह टेलीफोन टेप कांड से विवाद में भी आए। 

सुब्रमण्यम स्वामी

आपातकाल के दौरान ही बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी बड़े हीरो बनकर उभरे थे, वैसे तो उन्होंने इमरजेंसी से पहले ही इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इंदिरा गांधी ने 1970 बजट के बहस के दौरान स्वामी को अवास्तविक विचारों वाला सांता क्लॉज बताया था। स्वामी की ओर से रखे गए उदारवादी आर्थिक नीतियों की इंदिरा बहुत बड़ी विरोधी थीं। सुब्रमण्यम 1969 में दिल्ली आईआईटी से जुड़ गए थे। इस दौरान उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को पंचवर्षीय योजनाओं से दूर रहना चाहिए और बाहरी सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार 10 फीसदी विकास दर हासिल करना संभव था। स्वामी की यही बातें इंदिरा को नागवार गुजरी। उनकी नाराजगी के चलते स्वामी को दिसंबर 1972 में आईआईटी दिल्ली की नौकरी गंवानी पड़ी। बाद में 1991 में अदालत का फैसला स्वामी के पक्ष में आया। स्वामी को गिरफ्तारी करने के लिए पुलिस पूरा प्लान बना चुकी थी, उनकी नौकरशाहों के बीच में अच्छी पकड़ होने की वजह से वह बच गए। आपातकाल के दौरान ही वह 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण एक साथ रत्रिभोजन कर रहे थे, इस दौरान स्वामी ने जेपी से कहा कि कुछ बड़ा होने वाला है तो जेपी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया और कहा कि इंदिरा गांधी ऐसी मूर्खता नहीं करेंगी। अगली सुबह 4.30 बजे उन्हें एक कॉल आया जिसमें उन्हें पुलिस ने अप्रत्यक्ष रूप से बताया कि वो स्वामी को पकड़ने वाले हैं। स्वामी बच गए और वह 6 महीनों के लिए भूमिगत हो गए। इसी दौरान जेपी ने स्वामी से कहा कि आप अमेरिका चले जाइए और वहां आपातकाल के बारे में लोगों को जागरूक करो। डॉ स्वामी अमेरिका में जाकर हॉर्वर्ड में प्रोफेसर बन गए और हॉर्वर्ड के मंच का उपयोग करके आपातकाल को लेकर अमेरिका के 23 राज्यों में भारतीयों को जागरूक करना शुरू कर दिया। 

मुलायम सिंह यादव

पहलवानी के दांव में माहिर रहे मुलायम सिंह यादव सियासी पारी के दांव में भी माहिर थे। 15 साल की उम्र में ही राजनीतिक अखाड़े में कदम रखने वाले मुलायम सिंह यादव 1954 से आंदोलन में भाग लेने लगे। 1954 में उन्होंने समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के नहर रेट आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। इसके बाद वह राम सेवक यादव, कर्पूरी ठाकुर, जनेश्वर मिश्र और राज नारायण जैसे दिग्गजों के टच में आए। मुलायम सिंह यादव ने राजनीति के शुरुआती दिनों में मजदूर, किसान, पिछड़ों, छात्र व अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए जमकर आवाज उठाई। इसके बाद औपचारिक तौर पर मुलायम सिंह यादव 1960 में राजनीति का हिस्सा बने। पहली बार वह 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक बने। इसी दौरान आपातकाल के दौरान मुलायम सिंह यादव की जिंदगी में अहम मोड़ आया। इसी साल पहली बार यूपी सरकार में मंत्री बने और उन्हें सहकारिता व पशुपालन मंत्रालय मिला। 

लालू यादव

बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का सिक्का चलता था। 1990 से 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके लालू प्रसाद यादव का जन्म 11 जून 1948 को गोपालगंज जिले के फुलवरिया में हुआ था। उनके कार्यकाल में चारा घोटाला होने की वजह से वह रांची जेल में बंद हैं। चारा घोटाले में दिखाया गया है कि पशुओं को चारा खरीदने के लिए इतने पैसे निकाले गए। बाद में सीबीआई जांच में पता चला कि चारा के नाम पर घोटाला किया गया है। लालू प्रसाद यादव का जन्म बेहद ही गरीब परिवार में हुआ था और उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से बैचलर और लॉ की डिग्री हासिल की। यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ही उनका राजनीतिक सफर शुरू हो गया। पहली नौकरी उनकी बिहार वेटनरी कॉलेज, पटना में लगी थी जिसे छोड़कर वे जेपी आंदोलन में शामिल हो गए। 22 साल की उम्र में लालू यादव पहली बार राजनीति में आए और पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव बनाए गए। सन् 1975 में लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार किया गया और 77 तक वे जेल में बंद रहे। लालू यादव की बेटी का नाम मीसा भारती इसलिए पड़ा क्योंकि आपातकाल के दौरान लालू यादव को मीसा कानून के तहत जेल में डाला गया था। 1977 में 29 साल की उम्र में लालू यादव सांसद बने और सबसे कम उम्र के नेता का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कराया। उनके ऊपर साल 2004 में आई फिल्म पद्मश्री लालू प्रसाद यादव में उन्होंने गेस्ट अभिनेता के तौर पर काम किया। 

लालकृष्ण आडवाणी

भाजपा के वरिष्ठ नेता और संस्थापक सदस्य रहे लालकृष्ण आडवाणी आपातकाल के दौरान 19 महीने तक जेल में रहे। एनडीए सरकार में वो डिप्टी प्राइम मिनिस्टर रहे लालकृष्ण आडवाणी आपातकाल के दौरान जेपी आंदोलन से जुड़े और गुजरात में काम किया। गुजरात जून 1975 में बड़े बदलाव का गवाह बना।  खुद इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी को झटकों की शुरुआत 11 जून से हुई। उस दिन गुजरात विधानसभा के चुनावों के परिणाम आए थे। तब कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग गुजरात ढह में चुका था। गुजरात के सियासी फलक पर एक नई इबारत लिखी जा चुकी थी। मोरारजी देसाई के मार्गदर्शन में संयुक्त विपक्ष को चमत्कारिक सफलता मिली और कांग्रेस को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। उसी माहौल में गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद 15, 16 और 17 जून को जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) की कार्यकारिणी की बैठक माउंट आबू में हुई। देश की सत्ता में अहम रोल रखने वाले आडवाणी और अटल ही जोड़ी पूरे देश में प्रसिद्ध रही। 

चंद्रशेखर

भारत के नौं प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त करने वाले चंद्रशेखर बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी में जन्में थे। कांग्रेस से बागी तेवर अपनाने के कारण चंद्रशेखर 1975 में इमरजेंसी के दौरान उन कांग्रेसी नेताओं में से एक थे, जिन्हें विपक्षी दल के नेताओं के साथ जेल में ठूंस दिया गया। इमरजेंसी के बाद वे वापस आए और विपक्षी दलों की बनाई गई जनता पार्टी के अध्यक्ष बने। जब जनता दल की सरकारी बनी तो उन्होंने मंत्री बनने से इनकार कर दिया। सत्ता के संघर्ष में कभी इस तो कभी उस प्रत्याशी का समर्थन करते रहे। साल 1990 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला। जब वीपी सिंह सरकार बीजेपी के सपोर्ट वापस लेने के चलते अल्पमत में आ गई। उनके नेतृत्व में जनता दल में टूट हो गई और 64 सांसदों का धड़ा अलग हुआ और उसने सरकार बनाने का दावा ठोंक दिया। राजीव गांधी ने उन्हें समर्थन दिया और वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। 

चौधरी चरण सिंह

देश के पांचवें प्रधानमंत्री रहे किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह आपातकाल के दौरान तिहाड़ जेल में बंद रहे। आपातकाल के दौरान 25 जून 1975 से मार्च 1976 तक दिल्ली में बड़े नेता रहे। जेल से रिहा होने पर आपातकाल की भर्त्सना करते हुए उन्होंने इंदिरा गांधी के विरोध में 23 मार्च 1976 को यूपी की विधानसभा में चार घंटे तक ऐतिहासिक भाषण दिया। विपक्षी की एकता कायम करने के प्रयास उन्होंने जनसंघ का गठन किया। चौधरी चरण सिंह ने लगातार 40 सालों तक कांग्रेस की सेवा करने के बाद 1967 में पार्टी से इस्तीफा दिया और एक साल बाद भारतीय क्रांति दल का गठन किया था। 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी के गठन में भी चरण सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन इन्हीं चरण सिंह की जनता पार्टी सरकार को तोड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही। दो वर्ष से कम समय में ही केंद्र में गैर कांग्रेस सरकार का प्रयोग असफल हो गया और मोरारजी देसाई को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। मोराजी देसाई की सरकार गिर गई और सब नेता जनता पार्टी छोड़ने लगे। इसके बाद ही चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बना ली। चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 में प्रधानमंत्री बन गए। हालांकि, कुछ दिन बाद ही इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह की सरकार भी गिर गई। ये भी एक इतिहास है कि चरण सिंह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने कभी संसद का सामना नहीं किया। 

नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इमरजेंसी के दौरान 9/10 जून, 1976 की रात में गिरफ्तार हुये थे। वह भोजपुर जिले के संदेश थाना के दुबौली गांव से गिरफ्तार किये गये थे। नीतीश कुमार की गिरफ्तारी पर 15 पुलिस पदाधिकारियों तथा सिपाहियों को 2750 रुपये का इनाम मिला था। उन्हें गिरफ्तार करने वाले इसमें 20 सिपाही सादे लिबास में थे। अधिकारियों कसे सूचना मिली थी कि पटना और भोजपुर के कुछ आंदोलनकारी दुबौली गांव में एक बैठक करने जा रहे हैं। यही नहीं पटना की बैठक नीतीश कुमार ने बुलाई थी। इसी दौरान उनके साथ में दुबौली के महेन्द्र दूबे के मित्र भी साथ में थे। नीतीश कुमार के साथ गिरफ्तार किए जाने वाले भोजपुर जिले के चर्चित और पीरो के गांधी कहे जाने वाले नेता रामएकवाल वरसी भी थे। इस मामले में नीतीश कुमार सहित छह शीर्ष नेताओं को मीसा के तहत नजरबंद कर दिया गया था। 

शरद यादव

देश की समाजवादी राजनीति के बड़े स्तम्भ माने जाने वाले शरद यादव राजनीतिक रूप से करवट बदलते रहे हैं। 45 सालों से वो समाजवादी राजनीति की हर करवट के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष गवाह रहे हैं। कांग्रेस की संस्कृति और नीतियों के विरोध हमेशा ही आवाज बुलंद करने वाले शरद यादव बिहार की राजनीति के साथ ही साथ देश की राजनीतिक के भी बहुत बड़ा योगदान रखते हैं। आपातकाल के दौरान 25 जून 1975 को वह भी जेल में डाल दिए गए थे। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने इस दौरान आंदोलन के जनक जयप्रकाश नारायण समेत देश के सभी दिग्गज नेताओं को जेल में डाल दिया था। इन नेताओं में युवा शरद यादव भी शामिल थे जिनकी उम्र उस वक़्त केवल 28 साल थी और वो उनकी सियासी ज़िन्दगी के बिल्कुल शुरुआती साल थे। इस दौरान उनके पैरों में चोट भी लगी जिसका असर आजतक उनके पैरों में है। 

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