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ब्लॉग

ram mandir, rafale, riya

‘आर’नाम की लूट है, लूट सके तो लूट

06 August 2020

आनंद श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकारआरके यानी राज कपूर के निर्देशन में साल 1985 में एक फिल्म आई थी, ‘राम तेरी गंगा मैली’। मंदाकिनी और राजीव कपूर अभिनीत इस फिल्म के वैसे तो सभी गाने हिट हुए थे, पर रवींद्र जैन के संगीत निर्देशन में रिकार्ड हुआ गाना...’सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन’ की बात ही कुछ और थी। पैंतीस बरस बाद, एक बार फिर ‘आर’ की बहार है। माफ कीजिएगा हिंदी के ‘र’ की जगह हम अंग्रेजी के ‘R’ का सहारा ले रहे हैं। इस बार बस कलेवर थोड़ा बदला हुआ है, सो अबकी बार..’सुन साहिबा सुन,  ‘आर’ की धुन’।अब ‘आर’ बोले तो राम मंदिर,  राफेल, रिया चक्रवर्ती......।  नित नई ज्ञान गंगा बहाने वाले अपने ....बाबा तो हैं ही। आप तय कीजिए कि बाबा को आरडी मानेंगे या आरजी। अब आरडी और आरजी का मतलब समझाने की जिद ना कीजिएगा। कुल मिलाकर यह कि, जहां भी नजर घुमाइये, ‘आर’ की बयार है। सच कहें तो कई बार ‘आर’ , कोविड-19 पर भी भारी नजर आता है। कम से कम अपने देश में तो ऐसा ही है। यह सिर्फ हम नहीं कह रहे, खबरिया चैनलों की कवरेज भी इस बात की तसदीक करती है।

Corona Positve

'हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं'

25 July 2020

पूरी दुनिया के लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। हर दिन इससे संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर जगह दहशत का माहौल है। लेकिन इस बीच एक बड़ी अजीब चीज मैंने महसूस की है। यहां लोग कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति को बड़ी अजीब तरह से देखते हैं, ऐसा लगता है जैसे उसने कोई गुनाह-ए-अजीम कर दिया हो। मीडिया में ऐसे कई लोगों के बारे में रिपोर्ट्स आईं जो अपने घर से सिर्फ जरूरी सामान की खरीदारी के लिए निकलते थे और इससे बचाव के सारे नियमों का पालन भी करते थे, फिर भी कोरोना ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। इसके बावजूद ज्यादातर लोगों में इसे लेकर बेहद लापरवाही है। वे किसी कोरोना पॉजिटव व्यक्ति को भले ही हिकारत की नजरों से देखते हों लेकिन खुद को और अपने परिवार को इससे बचाने के लिए कुछ नहीं करेंगे। 

covid 19

‘कयामत से कयामत तक-2’

10 July 2020

आनंद पी श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकारसाल 1988 में एक फिल्म आई थी, कयामत से कयामत तक। इंडिया और काफी हद तक साउथ एशिया में, टीनएजर्स और यंगस्टर्स के बीच इस सुपरहिट फिल्म ने 'क्यूएसक्यूटी'  के तौर पर भी अपनी पहचान बनाई। इस फिल्म का एक गाना सुपरहिट हुआ था... अकेले हैं, तो क्या गम है, चाहें तो हमारे बस में क्या नहीं...। आज नौजवान होती पीढ़ी को शायद यह पता ना हो कि मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत को आवाज दी थी अलका अलका याग्निक और उदित नारायन ने। घरों, सड़कों, गलियों, चाक-चौबारों में या फिर स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में हर किसी की जुबान पर यह गाना चढ़ा और खूब चढ़ा, लेकिन तब यह शायद किसी को नहीं पता था कि उतरेगा कब। फोर्टीज और फिफ्टीज की हो रही उस पीढ़ी के लोगों के कान में आज भी यह गाना पड़ जाता है तो, उन्हें गुनगुनाते देखा/सुना जा सकता है।

sushant singh rajpoot

बॉलीवुड, नेपोटिज्म, सुशांत सिंह, कंगना रनौत और आप

16 June 2020

बीते दिनों हिंदुस्तान के तीन बड़े फिल्मी सितारों एक्टर इरफान खान (irfan khan), ऋषि कपूर (rishi kapoor), संगीतकार वाजिद खान (wajid khan) की मौत हो गई, लोग अभी इस घटना को भुला ही नहीं पाये थे कि अचानक एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (sushant singh rajpoot) की आत्महत्या ने सबको हिलाकर रख दिया। अपनी प्यारी सी मुस्कान के साथ हर किसी का दिल लूट लेने वाले सुशांत सिंह (sushant singh) का ऐसा करना हर किसी को अब ये सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर सुशांत ने आत्महत्या की क्यों?इस सवाल का जवाब अभी उनके चाहने वाले अपने मन में ढूंढ ही रहे थे कि अचानक बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत (kangna ranaut) ने सुशांत की मौत का कारण 'नेपोटिज्म' (nepotism) बता दिया, जिसके बाद से सुशांत के चाहने वालों ने ट्वीटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर सुशांत की मौत के जिम्मेदार लोगों को सजा देने और उनके बॉयकॉट की गुहार लगाने लगे।

irrfan khan

अभिनेता तो नहीं, क्या हम इरफान जैसे इंसान भी बन सकते हैं?

01 May 2020

रोहित मिश्र, पत्रकार, फिल्म समीक्षक  हम-आप जैसे लाखों मिडियोकर लोग अपने सिस्टम में खुद की 6 दिन या 6 हफ्ते की उपेक्षा भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। खुद की उपेक्षा करने वाले उस सिस्टम को लेकर एक टॉक्सिक हमारे मन में पलने लगता है। ये तेजाब सिस्टम का कुछ बिगाड़ या संवार तो नहीं पाता लेकिन यह हमें खुद ही गलाने लगता है। दिमाग और पर्सनाल्‍टी दोनों स्तरों पर। उपेक्षा की कुंठा बहुत हद तक प्रतिभा का गला घोट देती है।अब आइए इरफान की जिंदगी को देखें। एक कलाकार के रुप में उसे अभिनय करते हुए नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रुप में। देखें उसके धैर्य को और अपने प्रोफेशन को लेकर उसकी प्रतिबद्धता और अदब को।

rishi kapoor

पर्दे पर हर रंग को जी गए ‘चिंटू’

30 April 2020

इरफान खान के जाने पर रात तक जैसे-तैसे यकीन कर ही पाया था कि आज सुबह आंख खोलने के बाद जैसे ही फोन चेक किया तो पहला मैसेज था ‘ऋषि कपूर इज नो मोर’। यकीन नहीं हुआ तो आंखें साफ कर दोबारा देखा। किसी दिन की ऐसी मनहूस शुरुआत सोच भी नहीं सकता। जेहन में ऋषि कपूर के ढेरों गाने बजने लगे। दिलफरेब मुस्‍कान वाला चेहरा आंखों के सामने से हट ही नहीं रहा है।मुझे फ‍िल्‍में देखने का बेहद शौक है। अपने होश संभालने से आज तक ऋषि कपूर की शायद ही कोई मूवी होगी जो मैंने न देखी हो। मुझे लगता है वह हमेशा अपनी पीढ़ी के सफलतम अभिनेताओं की श्रेणी में सबसे आगे की पंक्ति में शामिल रहे। टीवी पर उनकी फ‍िल्‍मों को देखता था तो उनकी जगह खुद को रखकर जाने क्‍या-क्‍या ख्‍वाब बुनने लगता था।उनकी आकर्षक पर्सनालिटी को देखकर सोचता था कि काश मैं भी उनकी तरह दिखता। आप खुद सोचिए कि जितनी खूबसूरत जोड़ी ‘बॉबी’ में डिंपल कपाड़‍िया के साथ थी वही बात ‘बोल राधा बोल’ में जूही चावला और ‘दीवाना’ में दिव्‍या भारती के साथ थी।

Irrfan Khan

बहुत याद आओगे मेरे वियोगी ‘इरफान’

29 April 2020

ऐसे कौन जाता है मियां। ये किसी को मकबूल न होगा। अभी चंद रोज पहले ही तो हमने फैसला किया था कि अब रोएंगे नहीं। तुम रुला गए। ऐसे कौन करता है मियां। जब लगा था कि अब हंस नहीं पाएंगे, महसूस नहीं पाएंगे प्यार के अहसासों को…तब भी तुमने अपने मन का किया था। तब तुम वियोगी जी बनकर घुसे चले आए थे जबरदस्ती हमारी जिंदगी में। हम अकेले, तन्हा लोगों का कारवां छोड़कर तुम्हें क्या हासिल हुआ मियां इरफान खान। तुम तो भज लिए, हम कहां भज पाएंगे तुम्हारी तरह। तुम बड़े बेवफा निकले, इरफान! 

corona lockdown effect on women

कोरोना की महिलाओं पर दोहरी मार: ये समय साथ निभाने का है, बोझ बढ़ाने का नहीं

22 April 2020

कोरोना (Corona) से संक्रमित होने वालों में महिलाओं से ज्यादा भले पुरूषों की संख्या है लेकिन इस बीमारी का कहर महिलाओं पर दोहरा पड़ा है। इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी जब ये बीमारी महामारी बनी और पूरे देश को लॉकडाउन (lockdown) करने का आदेश आ गया। लॉकडाउन (lockdown) के बाद पति व बच्चों के पूरे दिन घर पर रहने का जहां एक ओर फायदा हुआ वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर काम का बोझ भी बढ़ा। बीते दिनों मेरी जिन भी घरेलू महिलाओं (housewife) से बात हुई है उनका सिर्फ एक ही कॉमन सवाल था कि ये लॉकडाउन कब खुलेगा। पहले भी ये महिलाओं का ज्यादातर समय घर के कामकाज में ही बीतता था, न ही कोई रोज का सैर-सपाटा करती थीं जो अब घर से बाहर न जाने का दुख हो। लेकिन अब इनकी चिंता रोजाना घर से बाहर जाने वाले पुरूषों से भी ज्यादा क्यों है? इस सवाल का जवाब शायद आपको अपने घरों में ही ढूंढने पर मिल जाएगा। आपके लिए भले ही ये दिन घर पर कुछ दिन आराम के बिताने के हों लेकिन इन घरेलू महिलाओं की दिनचर्या आज भी वही है। हां काम में भले इजाफा हुआ है क्योंकि अब 24 घंटा घर में रहने वाले पति और बच्चों की नई फरमाइशों का बोझ भी अकेले इनके कंधे पर ही आ गया है। नौकरीपेशा (Working women) महिलाओं का हाल अगर इस समय पूछ लें तो शायद उनकी परेशानियां आपको घंटों सुननी पड़ें। अब उनको एक ओर वर्क फार्म होम (work from home) में घर से काम करना पड़ रहा और दूसरी ओर घर का भी सारा काम उनके ही जिम्मे है क्योंकि औरत के घर में होने के बावजूद भारतीय पुरूष अगर काम करने लगे तो नाक नींची होने की पूरी संभावना होती है। ये स्थिति तनाव और डिप्रेशन (Depression) की है और हमेशा की तरह इसपर किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा। 

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दुनिया भारत की तरफ देख रही है और मैं 'ऊपर वाले' की तरफ

03 April 2020

सच लिखने की बहुत कीमत चुकाई गयी है। लेकिन सच लिखना जरूरी है। ऐसा सोचकर ही ये ब्लॉग लिख रहा हूं। क्या होगा, क्या नहीं...पता नहीं पर सड़क किनारे खड़े होकर सिर्फ शोर मचाऊं, ये मैं नहीं। तो सीधे मुद्दे की बात।

corona be positive

कोरोना: उम्मीद रखिए क्योंकि उम्मीद एक ज़िंदा शब्द है

25 March 2020

कोशिश करिए कि इस समय सिर्फ़ निराशा की बात न करें।ये वक़्त सिर्फ़ ऐसे आंकड़े और आर्टिकल शेयर करने का नहीं है जो ये बता रहे हैं कि कोरोना को रोक पाना लगभग असंभव है। फ़िलहाल भारत जैसे देश में सरकार जितने कड़े कदम उठा सकती थी, वो उससे कहीं अधिक कड़े कदम उठा चुकी है।घबराइए नहीं, अब बस उम्मीद रखिए क्योंकि उम्मीद एक ज़िन्दा शब्द है। सोचिए अब जब ये लॉकडाउन ख़त्म होगा तो हम हर उस छोटी आज़ादी की कितनी क़द्र करने लगेंगे जिसकी क़द्र हमने पहली कभी नहीं की। ये पहली बार है जब हम अपने देश में भीड़ देखने के लिए तरस रहे हैं। लॉक डाउन खुलने के बाद शोर गुल हमारे लिए संगीत बन जाएगा। 

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