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irrfan khan

अभिनेता तो नहीं, क्या हम इरफान जैसे इंसान भी बन सकते हैं?

01 May 2020

रोहित मिश्र, पत्रकार, फिल्म समीक्षक  हम-आप जैसे लाखों मिडियोकर लोग अपने सिस्टम में खुद की 6 दिन या 6 हफ्ते की उपेक्षा भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। खुद की उपेक्षा करने वाले उस सिस्टम को लेकर एक टॉक्सिक हमारे मन में पलने लगता है। ये तेजाब सिस्टम का कुछ बिगाड़ या संवार तो नहीं पाता लेकिन यह हमें खुद ही गलाने लगता है। दिमाग और पर्सनाल्‍टी दोनों स्तरों पर। उपेक्षा की कुंठा बहुत हद तक प्रतिभा का गला घोट देती है।अब आइए इरफान की जिंदगी को देखें। एक कलाकार के रुप में उसे अभिनय करते हुए नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रुप में। देखें उसके धैर्य को और अपने प्रोफेशन को लेकर उसकी प्रतिबद्धता और अदब को।

rishi kapoor

पर्दे पर हर रंग को जी गए ‘चिंटू’

30 April 2020

इरफान खान के जाने पर रात तक जैसे-तैसे यकीन कर ही पाया था कि आज सुबह आंख खोलने के बाद जैसे ही फोन चेक किया तो पहला मैसेज था ‘ऋषि कपूर इज नो मोर’। यकीन नहीं हुआ तो आंखें साफ कर दोबारा देखा। किसी दिन की ऐसी मनहूस शुरुआत सोच भी नहीं सकता। जेहन में ऋषि कपूर के ढेरों गाने बजने लगे। दिलफरेब मुस्‍कान वाला चेहरा आंखों के सामने से हट ही नहीं रहा है।मुझे फ‍िल्‍में देखने का बेहद शौक है। अपने होश संभालने से आज तक ऋषि कपूर की शायद ही कोई मूवी होगी जो मैंने न देखी हो। मुझे लगता है वह हमेशा अपनी पीढ़ी के सफलतम अभिनेताओं की श्रेणी में सबसे आगे की पंक्ति में शामिल रहे। टीवी पर उनकी फ‍िल्‍मों को देखता था तो उनकी जगह खुद को रखकर जाने क्‍या-क्‍या ख्‍वाब बुनने लगता था।उनकी आकर्षक पर्सनालिटी को देखकर सोचता था कि काश मैं भी उनकी तरह दिखता। आप खुद सोचिए कि जितनी खूबसूरत जोड़ी ‘बॉबी’ में डिंपल कपाड़‍िया के साथ थी वही बात ‘बोल राधा बोल’ में जूही चावला और ‘दीवाना’ में दिव्‍या भारती के साथ थी।

Irrfan Khan

बहुत याद आओगे मेरे वियोगी ‘इरफान’

29 April 2020

ऐसे कौन जाता है मियां। ये किसी को मकबूल न होगा। अभी चंद रोज पहले ही तो हमने फैसला किया था कि अब रोएंगे नहीं। तुम रुला गए। ऐसे कौन करता है मियां। जब लगा था कि अब हंस नहीं पाएंगे, महसूस नहीं पाएंगे प्यार के अहसासों को…तब भी तुमने अपने मन का किया था। तब तुम वियोगी जी बनकर घुसे चले आए थे जबरदस्ती हमारी जिंदगी में। हम अकेले, तन्हा लोगों का कारवां छोड़कर तुम्हें क्या हासिल हुआ मियां इरफान खान। तुम तो भज लिए, हम कहां भज पाएंगे तुम्हारी तरह। तुम बड़े बेवफा निकले, इरफान! 

corona lockdown effect on women

कोरोना की महिलाओं पर दोहरी मार: ये समय साथ निभाने का है, बोझ बढ़ाने का नहीं

22 April 2020

कोरोना (Corona) से संक्रमित होने वालों में महिलाओं से ज्यादा भले पुरूषों की संख्या है लेकिन इस बीमारी का कहर महिलाओं पर दोहरा पड़ा है। इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी जब ये बीमारी महामारी बनी और पूरे देश को लॉकडाउन (lockdown) करने का आदेश आ गया। लॉकडाउन (lockdown) के बाद पति व बच्चों के पूरे दिन घर पर रहने का जहां एक ओर फायदा हुआ वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर काम का बोझ भी बढ़ा। बीते दिनों मेरी जिन भी घरेलू महिलाओं (housewife) से बात हुई है उनका सिर्फ एक ही कॉमन सवाल था कि ये लॉकडाउन कब खुलेगा। पहले भी ये महिलाओं का ज्यादातर समय घर के कामकाज में ही बीतता था, न ही कोई रोज का सैर-सपाटा करती थीं जो अब घर से बाहर न जाने का दुख हो। लेकिन अब इनकी चिंता रोजाना घर से बाहर जाने वाले पुरूषों से भी ज्यादा क्यों है? इस सवाल का जवाब शायद आपको अपने घरों में ही ढूंढने पर मिल जाएगा। आपके लिए भले ही ये दिन घर पर कुछ दिन आराम के बिताने के हों लेकिन इन घरेलू महिलाओं की दिनचर्या आज भी वही है। हां काम में भले इजाफा हुआ है क्योंकि अब 24 घंटा घर में रहने वाले पति और बच्चों की नई फरमाइशों का बोझ भी अकेले इनके कंधे पर ही आ गया है। नौकरीपेशा (Working women) महिलाओं का हाल अगर इस समय पूछ लें तो शायद उनकी परेशानियां आपको घंटों सुननी पड़ें। अब उनको एक ओर वर्क फार्म होम (work from home) में घर से काम करना पड़ रहा और दूसरी ओर घर का भी सारा काम उनके ही जिम्मे है क्योंकि औरत के घर में होने के बावजूद भारतीय पुरूष अगर काम करने लगे तो नाक नींची होने की पूरी संभावना होती है। ये स्थिति तनाव और डिप्रेशन (Depression) की है और हमेशा की तरह इसपर किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा। 

blog

दुनिया भारत की तरफ देख रही है और मैं 'ऊपर वाले' की तरफ

03 April 2020

सच लिखने की बहुत कीमत चुकाई गयी है। लेकिन सच लिखना जरूरी है। ऐसा सोचकर ही ये ब्लॉग लिख रहा हूं। क्या होगा, क्या नहीं...पता नहीं पर सड़क किनारे खड़े होकर सिर्फ शोर मचाऊं, ये मैं नहीं। तो सीधे मुद्दे की बात।

corona be positive

कोरोना: उम्मीद रखिए क्योंकि उम्मीद एक ज़िंदा शब्द है

25 March 2020

कोशिश करिए कि इस समय सिर्फ़ निराशा की बात न करें।ये वक़्त सिर्फ़ ऐसे आंकड़े और आर्टिकल शेयर करने का नहीं है जो ये बता रहे हैं कि कोरोना को रोक पाना लगभग असंभव है। फ़िलहाल भारत जैसे देश में सरकार जितने कड़े कदम उठा सकती थी, वो उससे कहीं अधिक कड़े कदम उठा चुकी है।घबराइए नहीं, अब बस उम्मीद रखिए क्योंकि उम्मीद एक ज़िन्दा शब्द है। सोचिए अब जब ये लॉकडाउन ख़त्म होगा तो हम हर उस छोटी आज़ादी की कितनी क़द्र करने लगेंगे जिसकी क़द्र हमने पहली कभी नहीं की। ये पहली बार है जब हम अपने देश में भीड़ देखने के लिए तरस रहे हैं। लॉक डाउन खुलने के बाद शोर गुल हमारे लिए संगीत बन जाएगा। 

‘वर्क फ्रॉम होम’ के पेंचोखम और इसे सुलझाने की तरकीब

24 March 2020

डॉ. निखिल अग्रवालरिटेल, ट्रेडिंग या मैन्युफैक्चरिंग जैसे ज्यादातर छोटे व्यवसायों के पास इतनी सुविधा नहीं है कि वे ऑनलाइन बिजनेस कर सकें। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इस समय कोरोना वायरस का बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जिस स्थिति में आज हम हैं, वहां तक दोबारा आने में हमें बहुत वक्त लगेगा। आर्थिक आधार पर कहा जाए तो यह महामारी हमें दस साल पीछे ले जाने वाली है। हालांकि हम सक्षम और मजबूत हैं और हमें महामारियों से लड़ना भी आता है। हम तकनीक की मदद से लड़ेंगे और जीतेंगे भी।मुमकिन है कि आपको कई हफ्तों या महीनों घर पर ही रहना पड़े। जब तक हम इस महामारी का कोई इलाज नहीं ढूंढ़ लेते तब तक यह कहा नहीं जा सकता कि यह महीनों चलेगी या वर्षों। इसलिए इस बुरे वक्त में हमें यह ध्यान देना है कि हम लगातार प्रोडक्टिव बने रहें। ‘वर्क फ्रॉम होम’ यानी घर से ही ऑफिस का काम करना शुरू में तो मजेदार लग सकता है लेकिन जिन लोगों को इसकी आदत नहीं है उनकी प्रोडक्टिविटी पर बुरा असर पड़ सकता है।

chandra shekhar azad

पुण्यतिथि विशेष: 'मैं आजाद हूं, आज मैं बहुत दुखी हूं'

27 February 2020

मैं चंद्रशेखर आजाद हूं। 27 फरवरी को मैंने अपने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया था। पुण्यतिथि पर आज मुझको याद किया जाएगा, मेरी प्रतिमा-चित्रों पर फूल चढ़ाए जाएंगे, इंकलाब के नारे लगाए जाएंगे, लेकिन मैं बिलकुल भी खुश नहीं हूं। देश के 'दिल' में जो कुछ हो रहा है, उसने मेरा दिल दुखाया है। मैंने तो ऐसे देश के लिए जान न्योछावर की थी, जहां सब लोग मिल-जुलकर रहेंगे, लेकिन यह सब क्या हो रहा है? लोग एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। अगर आप वाकई में मुझे श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो पहले नफरत की दीवार गिराइए और भाईचारे के साथ रहिए।

priyanka reddy rape case

.....हर दिन 90 बलात्कार और कितने निर्भया कांड सहेगा देश

29 November 2019

सुबह आंख खुलते ही सोशल मीडिया पर एक लड़की की अधजली लाश देखना हर उस मां बाप के लिए दुखद है जिनकी बेटियां हर रोज पढ़ने या नौकरी के लिए घरों से निकलती हैं। हैदराबाद में पशु डॉक्टर की रेप के बाद जलाकर हत्या कर दी गई और इस घटना से पूरे देश में न केवल रोष और तकलीफ बढ़ी है बल्कि एक डर और शंका फिर से ताजी हुई है। ऐसी घटनाएं न सिर्फ संवेदनाओं को झकझरोती है बल्कि आगे बढ़ रही उन तमाम लड़कियों के मनोबल को भी कम करती हैं जिन्होंने ठान लिया था कि वो पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है। लेकिन वो वाकई इन जैसों की बराबरी तो कभी कर ही नहीं सकतीं। 

गरीबी, कुपोषण और सस्ती शिक्षा, जेएनयू के छात्रों का विरोध प्रदर्शन कितना सही?

20 November 2019

देश भर में इस समय जेएनयू का मुद्दा छाया है। कुछ वक्त पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों की फीस में बढ़ोतरी कर दी गई, जिसे लेकर हजारों छात्र छात्रावास शुल्क वृद्धि को पूरी तरह वापस लिए जाने की मांग को विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों के प्रदर्शन और छात्रावास शुल्क वृद्धि का मामला संसद में भी गर्माया हुआ है। हर तरफ इसकी चर्चा हो रही है। ये फीस वृद्धि सही है या गलत इस बारे में बात की जाएगी, लेकिन पहले ये जानना जरूरी है कि पहले जेएनयू की फीस कितनी थी और अब कितनी कर दी गई। 

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