आपने ब्रह्मास्त्र को लेकर कई बातें सुनी होंगी। रामायण या महाभारत सीरियल देखे होंगे तो आपको इसके बारे में जरूर याद होगा। कहते हैं कि प्रचीन काल में 5 ऐसे अस्त्र थे जो महाप्रलय ला सकते थे। इनमें सबसे पहले ब्रह्मास्त्र आता था, फिर नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र, वज्र और अंत में सुदर्शन चक्र। अगर आपके मन में भी ब्रह्मास्त्र के बारे में कुछ जानने को लेकर उत्सुकता है तो हम बताते हैं आपको इससे जुड़ी कुछ बातें…

1. जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि बह्मास्त्र की उत्पत्ति ब्रह्माजी ने की थी। वेदों-पुराणों में लिखा है कि दैत्यों के नाश के लिए ब्रह्माजी ने इसकी उत्पत्ति की थी। ब्रह्मा जी की तपस्या करने पर उन्होंने कई लोगों को ये अस्त्र दिया था। वैसे तो इसकी उत्पत्ति दैत्यों के नाश के लिए थी लेकिन मेघनाद ने भी अपनी कठोर तपस्या से इसे पा लिया था। 

2. शुरुआत में ये महान अस्त्र सिर्फ देवी और देवताओं के पास ही होता था। जैसी-जैसी जिस देवी या देवता की विशेषता होती थी उसी के अनुसार अस्त्र भी होता था। देवताओं से ब्रह्मास्त्र गंधर्वों को प्राप्त हुआ और बाद में मानवजाति को भी यह अस्त्र मिला। 

3. रामायण काल में ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण और विभीषण के पास था। महाभारत काल में द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास यह अस्त्र था। ऐसा कहते हैं कि परशुराम के पास भी ब्रह्मास्त्र था। 

4. महाभारत में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। रामायण में भी लक्ष्मण मेघनाद पर इसका प्रयोग करना चाहते थे लेकिन उन्हें राम ने रोक लिया था। हालांकि, कई जगह यह भी लिखा है कि राम-रावण युद्ध में इसका प्रयोग हुआ था। कर्ण भी अर्जुन पर इसका प्रयोग करना चाहते थे लेकिन वह इसका मंत्र भूल गए थे क्योंकि उनके गुरु परशुराम ने उन्हें ये श्राप दिया था। 

5. ब्रह्मास्त्र में इतनी ताकत होती थी कि इसके प्रयोग से प्रलय आ जाती थी। जिस पर ये अस्त्र छोड़ा जाता था उसका नाश करने की तो इसमें क्षमता थी ही, प्रकृति को भी कई वर्षों तक इसके असर का संताप झेलना पड़ता था। ब्रह्मास्त्र कई प्रकार के होते थे। छोटे-बड़े और व्यापक रूप से संहारक। इच्छित, रासायनिक, दिव्य तथा मांत्रिक-अस्त्र आदि। माना जाता है कि दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं।

6. महर्षि वेदव्यास लिखते हैं कि जहां ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता है वहां 12 वर्षों तक पर्जन्य वृष्टि (जीव-जंतु, पेड़-पौधे आदि की उत्पत्ति) नहीं हो पाती।’ महाभारत में उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मास्त्र के कारण गांव में रहने वाली स्त्रियों के गर्भ मारे गए थे। इसीलिए राम ने लक्ष्मण को इसका प्रयोग करने से रोक दिया था। अर्जुन ने भी महाभारत में इसीलिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं किया था।

7.  आपने महाभारत देखते समय इस बात पर गौर किया होगा कि ब्रह्मास्त्र को सिर्फ ब्रह्मास्त्र ही रोक सकता था। इसके अलावा किसी और अस्त्र में इतनी क्षमता नहीं थी कि वह इसे रोक ले। हां, अगर इसे छोड़ने के बाद इसके प्रभाव से बचना है तो इसे वापस लेना ही एक उपाय होता था। हालांकि, इसे वापस लेने के लिए भी एक प्रक्रिया होती थी और बिना इसके कोई इसे वापस नहीं ले सकता। अश्वत्थामा ने जब अर्जुन और श्रीकृष्ण पर ब्रह्मास्त्र चलाया था तब ऐसा ही हुआ था। लेकिन अश्वत्थामा को वापस लेने का तरीका नहीं याद था जिसके परिणामस्वरूप उससे उत्तरा के गर्भ की ओर इसे मोड़ दिया था लेकिन इसके असर से मृत जन्में शिशु को श्रीकृष्ण ने जीवित कर दिया था। हालांकि, इसके लिए अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण ने श्राप दिया था और कहते हैं कि आजतक अश्वत्थामा की मृत्यु नहीं हुई है और वह कलयुग में भी भटक रहे हैं।

8. 42 वर्ष पहले पुणे के डॉक्टर व लेखक पद्माकर विष्णु वर्तक ने अपने शोधकार्य के आधार पर कहा था कि महाभारत के समय जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था वह परमाणु बम के समान ही था। डॉ. वर्तक ने 1969-70 में एक किताब लिखी ‘स्वयंभू’। इसमें इसका उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि आधुनिक काल में जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर ने गीता और महाभारत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किया और अपने मिशन को नाम दिया ट्रिनिटी (त्रिदेव)। रॉबर्ट के नेतृत्व में 1939 से 1945 का बीच वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह कार्य किया। 16 जुलाई 1945 को इसका पहला परीक्षण किया गया।

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